चीन अगर भारत का 'दर्द' है तो 'दवा' भी
पिछले कई हफ़्तों से लद्दाख क्षेत्र में दोनों देशों की सीमा- वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी), पर जारी तनाव बढ़ता गया और आख़िरकार गलवान घाटी में भारत-चीन सैनिकों के बीच 'घंटों चली हाथापाई और झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई और 76 अन्य घायल हुए.
चीन की तरफ़ से अभी तक हताहतों या घायलों पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
पिछले दो दशकों में भारत और चीन के बीच का व्यापार 30 गुना बढ़ा है. यानी जहाँ 2001 में कुल व्यापार तीन अरब डॉलर का था तो 2019 आते-आते ये 90 अरब डॉलर छू रहा था.
इस व्यापार में जिन चीज़ों की मात्रा तेज़ी से बढ़ी है उनमें दवाइयाँ शामिल हैं. ख़ासतौर से पिछले एक दशक के दौरान जब दवाइयों के आयात में 28% का उछाल दर्ज किया गया.
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2019-20 के दौरान भारत ने चीन से 1,150 करोड़ रुपए के फ़ार्मा प्रॉडक्ट्स आयात किए जबकि इसी दौरान चीन से भारत आने वाले कुल आयात क़रीब 15,000 करोड़ रुपए के थे.
बात दवाओं की हो तो जेनेरिक दवाएं बनाने और उनके निर्यात में भारत अव्वल है. साल 2019 में भारत ने 201 देशों से जेनेरिक दवाई बेची और अरबों रुपए की कमाई की.
लेकिन आज भी भारत इन दवाओं को बनाने के लिए चीन पर निर्भर है और दवाओं के प्रोडक्शन के लिए चीन से एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स (API) आयात करता है. इसे दवाइयां बनाने का कच्चा माल या बल्क ड्रग्स के नाम से जाना जाता है.
इंडस्ट्री के जानकार बताते हैं कि भारत में दवा बनाने के लिए आयात होने वाली कुल बल्क ड्रग्स या कच्चे माल में से 70% तक चीन से ही आता है.
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