Surprise Me!

ओडिशा में गजपति के आदिवासी सदियों से इम्यूनिटी के लिए 'काई' लाल चींटी की चटनी पर क्यों निर्भर हैं?

2026-01-29 19 Dailymotion

ओडिशा के गजपति के आदिवासी आज भी लाल चींटियों का चटनी खाते है. यहां के गुमा ब्लॉक में आदिवासी परिवार इसे पीढ़ियों से एक पौष्टिक भोजन के रूप में खा रहे हैं, जो उनकी परंपरा से जुड़ा है. भुइयां आदिवासी समुदाय के सदस्यों ने बताया कि पहाड़ी जंगलों से इकट्ठा की गई लाल चींटियों से बनी यह चटनी इम्यूनिटी बूस्टर की तरह काम करती है. जंगलों में घूमते समय, वे पेड़ों पर चींटियों की कॉलोनियों की जगह पहचानते हैं, चींटियों को सावधानी से इकट्ठा करते हैं और उन्हें थोड़ी देर आग पर गर्म करते हैं. फिर चींटियों को प्याज, लहसुन, अदरक, मिर्च और नमक के साथ पत्थर पर पीसकर एक तीखी चटनी बनाई जाती है और इसे ये चावल के साथ खाते हैं. बबुला भुइयां ने इस प्रक्रिया के बारे में बताया और कहा, “हम अलग-अलग पेड़ों से काई इकट्ठा करते हैं, उसे आग पर गर्म करते हैं क्योंकि इससे गंदगी जल जाती है, फिर हम इसे अदरक, मिर्च, प्याज, लहसुन और नमक के साथ पीसते हैं। हम इसे गर्म मंडिया जाउ या पखाल के साथ खाते हैं। यह सिर्फ़ एक साइड डिश नहीं है बल्कि हमारी पसंदीदा है क्योंकि यह कई बीमारियों को ठीक करने में मदद करती है।” एक अन्य आदिवासी ने कहा, “इसे खाने से घुटनों और जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है और आंखों की रोशनी तेज़ होती है। यह सर्दी, खांसी और बुखार को ठीक करती है। हमारे पूर्वज इसे खाते थे, और हम इस परंपरा को जारी रखे हुए हैं। हम इसे भोजन और दवा दोनों के रूप में इस्तेमाल करते हैं।” अदिवासियों के इस दावे को लेकर एक डॉक्टर से बात की गई. तो इन्होंने इसे खतरनाक बताते हुए पेट संबंधी बीमारियों के होने की आशंका जताई. आदिवासियों में जागरुकता फैलाने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है. कई समाजिक संगठन भी इनके लिए काम कर रहे हैं. लेकिन ओडिशा के इस आदिवासी इलाके में आज भी सदियों पुरानी खाने की परंपरा कायम है.