ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर की सड़कें बेंत और बांस के तरह-तरह के प्रोडक्ट्स से भरी पड़ी हैं. रंग-बिरंगी टोकरियाँ, फूलदान, टेबल लैंप और सोफे यहां सजे हुए हैं. बांस के ये कारीगर ग्राहकों के इंतज़ार में बैठे हैं. यह बिज़नेस कोई नई बात नहीं है. इनकी पीढ़ियाँ इसी सड़क किनारे अपना बिज़नेस चलाती आ रही हैं. बांस के इन प्रोडक्ट्स ने वाई दलिया और लक्ष्मी जैसे कारीगरों को रोज़ी-रोटी दी है. 60 साल पहले उनके पिता आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले के पलासा से आए थे और भुवनेश्वर में बिज़नेस शुरू किया था. अब वे इसे आगे बढ़ा रहे हैं. वे सुबह रस्सी खींचने बैठ जाते हैं. वे बांस काटते हैं. यह काम करते-करते उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब सुबह से शाम हो गई. जब सूरज डूब जाता है. तो वे गांव में झोपड़ी में लौट आते हैं. झोपड़ी में ही वर्तमान से संघर्ष शुरू होता है. बाहर से सीधे-सादे और खुश दिखने वाले इन लोगों की असल ज़िंदगी बहुत दुख भरी है. इनके प्रोडक्ट्स की मांग तो बढ़ रही है. लेकिन उन्हें उतना पैसा नहीं मिल रहा है. वे पहले 10 रुपये में बांस का एक टुकड़ा खरीदते थे. आज उसकी कीमत 300 रुपये है. ट्रॉली का किराया 60 रुपये है. ये गर्मी और ठंड की परवाह किए बिना सड़क किनारे जमे रहते हैं. दो जून की रोटी के लिए. लेकिन सरकार की तरफ से उन्हें वेंडिंग ज़ोन। नहीं दिया गया. दूसरी तरफ आर्थिक तंगी से भी जूझ रहे हैं.ऐसे में बस इन्हें सरकार से मदद की दरकार है.