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दशम द्वार : चेतना का अवतरण -गुलाब कोठारी

2026-05-08 131 Dailymotion

नवद्वारों का पिंजरा तामे पंछी पौन
रहने को अचरज है, उड़ै अचंभा कौन?
पिंजरा माया है, अचरज माया है, अचंभा भी माया है। द्वार सदा खुले हैं किन्तु पंछी उड़ नहीं पाता। यही माया है। यही माटी की इस देह की कहानी है। कैसा खिलौना है। पंचकोश और 9 द्वार। दो आंख-कान-नाक (6), मुंह, गुदा, मूत्र द्वार (9)। ये सारे पंचतत्त्व के प्रतीक हैं, दैहिक कर्मों के संचालक हैं। सभी स्थूल प्राणी-युगलों में कार्य करते हैं। क्षर सृष्टि के अंग हैं और प्रकृति के नियंत्रण में कार्य करते हैं। इनके भीतर ही प्राण रूप आत्मा (पंछी) का वास है। शरीर ही ब्रह्माण्ड शृंखला में सुनें पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख- दशम द्वार : चेतना का अवतरण