कुछ दिन पहले पासपोर्ट पर भारतीय विदेश मंत्रालय के एक बयान से तूफान मच गया . विपक्षी पार्टियां सरकार पर बरस पड़ी हैं. उनका कहना था कि अगर पासपोर्ट को भारत की नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा, तो फिर किस दस्तावेज पर सरकार भरोसा करेगी ?. विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के इस बयान ने कि भारतीय पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में, कानूनी और राजनीतिक हलकों में व्यापक बहस छेड़ दी . विवाद बढ़ते ही केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कोई नया कानूनी रुख नहीं है. इन बयानों से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई, क्योंकि कई भारतीय नियमित रूप से पासपोर्ट को पहचान के सबसे विश्वसनीय रूपों में से एक के रूप में उपयोग करते हैं, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने सवाल उठाया कि सरकारी पासपोर्ट नागरिकता का निर्णायक प्रमाण कैसे नहीं हो सकता, जबकि इसे प्राप्त करने में पुलिस सत्यापन और दस्तावेज जांच शामिल होती है. सरकार ने जवाब देते हुए कहा कि यह कानूनी स्थिति दशकों से चली आ रही है और इसे न तो हाल ही में लागू किया गया है और न ही पिछले 12 वर्षों में इसमें कोई बदलाव किया गया है.